भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 18 का परिचय
राजा द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और अन्य, हे राजन, जैसे सुभद्रा के महाबलशाली पुत्र वीर अभिमन्यु सभी ने अपने-अपने शंख बजाए।
आत्मविश्वास या अति-आत्मविश्वास?
"सञ्जय उवाच:"
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते |
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ||1.18||
इस श्लोक में पांडव पक्ष के अन्य वीर योद्धाओं का वर्णन किया गया है। राजा द्रुपद, उनके वीर पुत्र (द्रौपदी के पाँचों पुत्र) और सुभद्रा के पुत्र, अभिमन्यु जैसे पराक्रमी योद्धाओं ने भी अपने-अपने शंख बजाए। यह केवल युद्ध की घोषणा नहीं थी, बल्कि यह उनके साहस, आत्मविश्वास और न्याय के प्रति अटूट संकल्प को दर्शाता था।
यहाँ खास बात यह है कि द्रौपदी के पुत्रों का उल्लेख किया गया है, जो दर्शाता है कि यह युद्ध केवल राज्यों के लिए नहीं, बल्कि मान-सम्मान और न्याय के लिए लड़ा जा रहा था। पांडवों के साथ धर्म था, इसलिए उनके साथ योद्धाओं का जोश और संकल्प भी अधिक था।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जब हम किसी सच्चे उद्देश्य के लिए खड़े होते हैं, तो हमारी सेना भी मजबूत होती है और हर व्यक्ति अपने संकल्प के साथ उसमें योगदान देता है। >
![]() |
| भगवद् गीता अध्याय 1 श्लोक 18 |
भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी
1. इस श्लोक 1.18 में किनके शंख बजाने का वर्णन किया गया है?
2. राजा द्रुपद कौन थे?
3. द्रौपदी के पुत्रों को किस नाम से जाना जाता है?
4. इस श्लोक में 'सौभद्र' शब्द का क्या तात्पर्य है?
5. पांडवों की ओर से शंखनाद का क्या महत्व था?
6. द्रौपदी के कितने पुत्र थे?
7. इस श्लोक से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
8. द्रुपद और उनके पुत्रों के शंखनाद का क्या संकेत था?
9. इस श्लोक में जिन योद्धाओं का वर्णन है, वे किस पक्ष से थे?
10. इस श्लोक के अनुसार, युद्ध केवल राजपाट के लिए नहीं था बल्कि किस उद्देश्य के लिए लड़ा जा रहा था?

